केंद्रीय विद्यालय भा.नौ.सेना पोत,
वालसुरा
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राजेंद्र सिंह
शेखावत [प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक ‘हिंदी’] |
विद्यालय पत्रिका -2019-20
हम किसी से कम नहीं
नहीं
चाहिए दया मुझे कोई भी, मैं काँटों के रस्ते अपनाता हूँ|
फूलों
पर चलना तो है तौहीन हमारी,अंगारों पर चलकर मंजिल मैं पाता हूँ|
नहीं
चाहिए दया मुझे कोई भी, .................................................
कोई
कमी नहीं हिम्मत की इस सीने में,
मजा
नहीं बिना कठिनाई जीने में |
किस्मत
का रुख अपने मन से मैं जोडूगां,
स्वप्न
लोक को धरती पर लाकर छोडूगां |
है
नहीं खौफ दुनिया में मुझको कोई,
मौत
के संग जीवन में गौते खाता हूँ|
नहीं
चाहिए दया मुझे कोई भी, मैं काँटों के रस्ते अपनाता हूँ|
फूलों
पर चलना तो है तौहीन हमारी,अंगारों पर चलकर मंजिल मैं पाता हूँ|
उमेश
कुमार ‘’ऐश्वर्य’’
स्नातकोत्तर शिक्षक ‘भौतिक विज्ञान ’
के.वि.भा.नौसेना
पोत,वालसुरा जामनगर
ऐ मेरे प्यारे
वतन, ऐ मेरे बिछड़े
चमन
ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन
तुझ पे दिल क़ुरबान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू
तू ही मेरी जान
तेरे दामन से जो आए उन हवाओं को सलाम
चूम लूँ मैं उस ज़ुबाँ को जिसपे आए तेरा
नाम
सबसे प्यारी सुबह तेरी
सबसे रंगीं तेरी शाम
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
माँ का दिल बनके कभी सीने से लग जाता है
तू
और कभी नन्हीं सी बेटी बन के याद आता है
तू
जितना याद आता है मुझको
उतना तड़पाता है तू
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
छोड़ कर तेरी ज़मीं को दूर आ पहुंचे हैं हम
फिर भी है ये ही तमन्ना तेरे ज़र्रों की
क़सम
हम जहाँ पैदा हुए
उस जगह पे ही निकले दम
तुझ पे दिल क़ुरबान ...
कवि -प्रेम धवन
संकलन
श्री इन्द्रमल
स्नातकोत्तर
शिक्षक ‘रसायन विज्ञान ’
के.वि.भा.नौसेना पोत,वालसुरा जामनगर
क्या धन ही अब जीवन है?
क्या धन ही अब जीवन है?
अपनों
का क्या कोई मोल नहीं ?
माँ
के आँचल में जो छुपा प्यार,
संसार
में जिसका तोल नहीं |
लगते
अपने बेगाने से ,
धन
के लोभी गद्दारों को |
मरने
को जिसने छोड़ दिया,
पैसों
की खातिर प्यारों को|
हाथ
पकड़ चलना सीखा ,
सीखा
चलना दीवारों पे |
वो
पैसों की खातिर चढ़ बैठा,
अपनों
की बनी मीनारों पे |
उगता
सूरज बहती धारा का
क्या
अब भी कोई छोर नहीं
क्या
धन ही अब जीवन है?
अपनों
का क्या कोई मोल नहीं ?
राजेन्द्र सिंह शेखावत
प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (हिंदी)
के.वि.भा.नौसेना पोत,वालसुरा जामनगर
जिस देश का बच्चा भूखा
है |
जिस
देश का बच्चा भूखा है,
तुम उसमें
जश्न मानते हो |
सिर्फ
एक दिखावे की खातिर
पानी
सा द्रव्य बहाते हो |
आये
थे जब तुम सत्ता में
कहते
थे हम रोटी देंगे ,
प्यासे
को दे देंगे पानी
अंधे
को लाठी हम लाठी देंगे |
पर
आज दिखा जो रूप तेरा
उस
रूप को हम खुनी कहेंगे
जिस
देश का बच्चा भूखा है,
तुम उसमें
जश्न मानते हो ,
सिर्फ
एक दिखावे की खातिर
पानी
सा द्रव्य बहाते हो |
राजेन्द्र
सिंह शेखावत
प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (हिंदी)
के.वि.भा.नौसेना पोत,वालसुरा,जामनगर
अगर पेड़ भी चलते होते
अगर पेड़ भी चलते होते
कितने मजे हमारे होते
बांध तने में उनके रस्सी
चाहें जहाँ कहीं ले जाते
जहाँ कहीं भी धूप सताती
उनके नीचे झट सुस्ताते
जहाँ कहीं भी वर्षा हो जाती
उनके नीचे हम छिप जाते
लगती जब भी भूख अचानक
तोड़ मधुर फल उसके खाते
आती कीचड़ बाढ़ कहीं तो
झट उसके ऊपर चढ़ जाते
अगर पेड़ भी चलते होते
कितने मजे हमारे होते
ध्रुव करमूर
कक्षा- 9 ‘अ’
जीवन
मुश्किल
से मिलती है ये जिन्दगी
इसे
बर्बाद करने पर मत लग जाओ
अँधेरा
तो अभी है
सवेरे
को जल्दी बुलाओ
अगर
कहीं चूक जाओ
मेहनत
करके उस गलती को वापस मत दोहराओ
इतना
आसन नहीं है हर चीज में सफलता पाना
कोशिश
करो और सफलता को पार कर जाओ
जिन्दगी
में कई ठोकरे आएगी
इसका
मुस्कराते हुए सामना करो
जब
साथ हो तुम्हारे अपने फिर हर कठिनाई को पार कर जाओ
महक
कोडवाल
कक्षा- 9 ‘अ’
माँ
भगवान
का दूसरा रूप है माँ
उनके
लिए दे देंगे जां
हमको
मिलता जीवन उनसे
कदमों
में है स्वर्ग बसा
हमारी
ख़ुशी में खुश हो जाती
दुःख
में हमारे आंसू बहाती
कितने
खुशनसीब है हम
पास
हमारे है माँ
अल्ताफ खान
कक्षा –9 ‘अ’
पत्तियों का चिड़ियाघर
पत्तियों
का चिड़ियाघर
पेड़ों
के कपडे है पत्ते
पेड़
उन्ही को पहने रहते
पेड़ो
के बस्ते में होते
खेल
खिलौने सस्ते-सस्ते
पत्तों
का भी है संसार
पत्तों
के हैं कई प्रकार
हर
पत्ते का है आकर
केले
बरगद और अनार
पत्तों
को छूकर तो देखो
उनसे
हाथ मिलाओ तुम
हंसी-
खेल में, बातचीत में
उनको
मित्र बनाओं तुम
अखबारों
की तह के भीतर
उनको नींद सुलाओ तुम
अगर
नींद सेजाग उठे तो
गुन-गुन
गीत सुनाओ तुम
पेड़ो
के पत्तों से बच्चों
बनता
सुन्दर चिड़ियाघर
सैर
करो तुम आज उसी की
जल्दी
आओ करो सफ़र
कवि –अरविन्द गुप्ता
चौहान दिपीशा
कक्षा- 9 ‘अ’
समय आ रहा अनन्त शान्त से
न बूझो न देखो क्लान्त श्रान्त से
कभी समय केवल मात्र नाम था
उसमे भी केवल घ्रर उद्दम था
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम शान्त थी
प्रलय आ गया फिर कोश प्रान्त से
सचेत किया किया न वो अंकित
प्रलय का होना चाहिए सिध्दांत से
मची फिर तबाही हुआ वो न संकेत
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम क्लान्त थी
निश्चय ही आयी घटा को अंगडाई
कई वर्ष बीते दुनिया बस आयी
उसमें भी थमी न आग बन पायी
कभी ज्वाला फूटे कभी भूकम्प आयी
कवि- करन कोविंद
पलक यादव
कक्षा –10 ‘ब’
खाली नहीं और खाली
मकान
नहीं खाली है
दूकान
नहीं खाली है
स्कूल
नहीं खाली, खाली नहीं कॉलेज
खाली
नहीं टेबुल, खाली नहीं मेज
खाली
अस्पताल नहीं
खाली
है हाल नहीं
खाली
नहीं चेयर, खाली नहीं सीट
खाली
नहीं फुटपाथ, खाली नहीं स्ट्रीट
खाली
नहीं ट्राम, खाली नहीं ट्रेन
खाली
नहीं माइंड, खाली नहीं ब्रेन
खाली
है हाथ, खाली है पेट
खाली
है थाली, खाली है प्लेट
कवि – नागार्जुन
कार्तिक कक्षा-
6 ‘अ’
गगन गगन है गान
तुम्हारा
गगन गगन है गान तुम्हारा,
घन घन जीवनयान तुम्हारा।
नयन नयन खोले हैं यौवन,
यौवन यौवन बांधे सुनयन,
तन तन मन साधे मन मन तन,
मानव मानव मान तुम्हारा।
क्षिति को जल, जल को सित उत्पल,
उत्पल को रवि, ज्योतिर्मण्डल,
रवि को नील गगनतल पुष्कल,
विद्यमान है दान तुम्हारा।
बालों को क्रीड़ाप्रवाल हैं,
युवकों को तनु, कुसुम-माल हैं,
वृद्धों को तप, आलबाल हैं,
छुटा-मिला जप ध्यान तुम्हारा।
कवि- सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
अलशिफा खान
कक्षा –10 ‘ब’
कौन है वो ?
माँ है वो ,
जो करवाए मैट्रिक पास,
वो है जिन्दगी में सबसे खास ,
डांट डांट कर हमें पढ़ाती ,
डॉक्टर –इंजीनियर हमें बनाती |
कुछ नया करने की चाह बतलाती,
भरी रातों को अपनी कहानियों से दिल हमारा
बहलाती |
किंजल
कक्षा -9 ‘ब’
क्या ?
क्या ? जाना जनाब
ज़िन्दगी से हमारे
हम वो डूबता सूरज हैं जो
कल एक नया सवेरा लेकर आएगा|
किंजल
कक्षा -9 ‘ब’
जिया करो
यादों
की बातों में,
ख्यालों
के ख्वाबों में ,
उन
यादों के सपनों में ,
हर
रोज में जिया करो |
उन
तमन्नाओं की यादों को ,
समेट
कर रखा करो |
हर
रोज उन बातों को ,
याद
किया करो |
उन
बातों में जिया करो |
दीया रावल
कक्षा- 9 ‘ब’
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